अमृतकुंड की सफाई में सामने आया प्राचीन शिवलिंग, श्रद्धालुओं में दर्शन करने की बढ़ी उत्सुकता
महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित प्रसिद्ध त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर से एक अद्धभूत नज़ारा देखने को मिला। दरअसल, मंदिर परिसर में मौजूद अमृतकुंड की सफाई के दौरान उसके तल में एक प्राचीन शिवलिंग दिखाई दिया। यह दुर्लभ दृश्य कई वर्षों बाद देखने को मिला, जिससे श्रद्धालुओं और मंदिर प्रशासन के बीच दर्शन करने का एक अलग उत्साह का माहौल है।
ASI के संरक्षण कार्य के दौरान हुआ खुलासा
मंदिर परिसर में चल रहे संरक्षण और रखरखाव कार्य के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने अमृतकुंड का पानी पूरी तरह निकालकर उसकी सफाई शुरू की। जब कुंड का पानी खाली हुआ तो उसके तल में मौजूद प्राचीन शिवलिंग साफ तौर पर दिखाई देने लगा। बताया जा रहा है कि सामान्य दिनों में यह शिवलिंग पानी के भीतर ही रहता है, इसलिए इसके दर्शन संभव नहीं हो पाते।
65 फीट गहरा है अमृतकुंड
अमृतकुंड लगभग 65 फीट गहरा माना जाता है और इसका निर्माण पेशवा काल में हुआ था। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी कुंड के पवित्र जल का उपयोग त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दैनिक अभिषेक और पूजा में किया जाता है। यही कारण है कि इस कुंड का धार्मिक महत्व बहुत अधिक माना जाता है।
???? HUGE! Shivling DISCOVERED after many years in the historic Amrit Kund at Trimbakeshwar Temple in Nashik.
ASI drained the water during conservation work, revealing it at the bottom of the 65-foot-deep reservoir.
Water from this Peshwa-era kund is used for puja-abhishek. pic.twitter.com/w1UYtsMnMS
— Megh Updates ????™ (@MeghUpdates) June 29, 2026
श्रद्धालुओं की एंट्री पर रोक
सुरक्षा और संरक्षण को ध्यान में रखते हुए अमृतकुंड में आम लोगों का एंट्री बैन कर दी है। यह इलाका हमेशा सुरक्षित रखा जाता है ताकि ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे। इसलिए शिवलिंग के इस दुर्लभ दर्शन का लाभ केवल सफाई और संरक्षण कार्य के दौरान ही देखने को मिला।
मंदिर का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व
त्र्यंबकेश्वर मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह महाराष्ट्र के नासिक शहर से लगभग 28 किलोमीटर दूर ब्रह्मगिरि पर्वत की तलहटी में स्थित है। 'त्र्यंबक' शब्द का अर्थ ब्रह्मा, विष्णु और महेश से जुड़ा माना जाता है।
मंदिर के पास स्थित ब्रह्मगिरि पर्वत को गोदावरी नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। वहीं, परिसर में मौजूद कुशावर्त कुंड भी श्रद्धालुओं के लिए बेहद पवित्र माना जाता है। बता दें कि त्र्यंबकेश्वर मंदिर का निर्माण नानासाहेब पेशवा ने वर्ष 1755 से 1786 के बीच कराया था, जबकि कुशावर्त कुंड का निर्माण सरदार रावसाहेब पार्नेकर द्वारा करवाया गया था।

Reporter 