नकटी गांव प्रकरण : नोटिस से पुनर्वास तक,समाधान की दिशा में बढ़ते कदम - नोटिस, कार्रवाई, पुनर्वास और राजनीति का सच
(विशेष लेख : प्रशांत सहाय की कलम से)
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगे नकटी गांव का मामला पिछले कुछ समय में राज्य की सबसे चर्चित प्रशासनिक घटनाओं में शामिल रहा। सरकारी भूमि पर अतिक्रमण, पुनर्वास, आदिवासी एवं गरीब परिवारों के अधिकार, विकास परियोजनाएं और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप—इन सभी पहलुओं ने इस प्रकरण को स्थानीय विवाद से निकालकर राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया।
यह मामला केवल बुलडोजर कार्रवाई का नहीं था, बल्कि इसने यह प्रश्न भी खड़ा किया कि विकास परियोजनाओं, कानून के शासन और मानवीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
विदित हो कि नकटी गांव प्रकरण केवल अतिक्रमण हटाने का मामला नहीं रहा, बल्कि इसने विकास परियोजनाओं, कानूनी प्रक्रिया, पुनर्वास और मानवीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन की आवश्यकता को भी सामने रखा। सरकार इसे नियमानुसार कार्रवाई और पुनर्वास के साथ आगे बढ़ाई गई प्रक्रिया बताती है,जबकि आलोचकों ने इसके क्रियान्वयन के तरीके पर सवाल उठाए हैं।
बहरहाल नकटी गांव प्रकरण को केवल बुलडोजर कार्रवाई के रूप में देखना अधूरा होगा। यह मामला कानून के शासन, सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा, विकास परियोजनाओं, आदिवासी एवं गरीब परिवारों के हितों और पुनर्वास की संवेदनशीलता सभी का संगम है।
विष्णु देव साय सरकार के लिए यह प्रशासनिक क्षमता और संवेदनशील शासन की परीक्षा थी। सरकार का दावा है कि उसने कानून के पालन के साथ पुनर्वास को प्राथमिकता दी, जबकि विपक्ष का कहना है कि प्रक्रिया और पुनर्वास के क्रियान्वयन पर अभी भी सुधार की आवश्यकता है।
अंततः किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे मामलों की सफलता का वास्तविक पैमाना यही होगा कि विकास की परियोजनाएं आगे बढ़ें, सार्वजनिक संपत्ति सुरक्षित रहे और कोई भी पात्र परिवार सम्मानजनक जीवन से वंचित न हो। यही संतुलन सुशासन की वास्तविक पहचान है।
क्या है पूरा मामला
रायपुर से लगे सम्मानपुर (नकटी) गांव का मामला सबसे पहले वर्ष 2025 में तब चर्चा में आया, जब प्रशासन ने लगभग 80 परिवारों को अतिक्रमण हटाने संबंधी नोटिस जारी किए। प्रशासन का पक्ष था कि भूमि सरकारी परियोजना के लिए चिन्हित है,जबकि प्रभावित परिवारों ने लंबे समय से निवास और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने का हवाला देते हुए बेदखली का विरोध किया।
इसके बाद कई महीनों तक सर्वेक्षण, आपत्तियां, जनप्रतिनिधियों की मुलाकातें और प्रशासनिक स्तर पर विचार-विमर्श चलता रहा। मामला समय-समय पर राजनीतिक बहस का विषय भी बना।
जून 2026 के अंतिम सप्ताह में प्रशासन ने 77 परिवारों को 48 घंटे के भीतर भूमि खाली करने का नोटिस जारी किया। नोटिस के बाद ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया और प्रशासन तथा ग्रामीणों के बीच तनाव की स्थिति बनी।
इसके बाद प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की। इस कार्रवाई के दौरान कई मकान हटाए गए, जिसे लेकर प्रदेशभर में राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिली। विपक्ष ने कार्रवाई की आलोचना की, जबकि प्रशासन ने इसे न्यायालयीय एवं प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुरूप बताया।
पुनर्वास बना सबसे महत्वपूर्ण पहलू
इस पूरे प्रकरण में सबसे सकारात्मक पहलू पुनर्वास को माना गया। प्रशासन ने पात्र परिवारों की पहचान कर उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराने का प्रयास किया। कई परिवारों को शासकीय योजनाओं से जोड़ने की प्रक्रिया तेज की गई।
सरकार ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि कार्रवाई का उद्देश्य किसी को बेघर करना नहीं, बल्कि कानून के पालन के साथ वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करना है।
क्या कहता है कानून
भूमि, वन और राजस्व से जुड़े मामलों में प्रशासन को अतिक्रमण हटाने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन इसके साथ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन भी आवश्यक है। नोटिस, सुनवाई का अवसर और पात्र मामलों में लागू कानूनों के अनुसार निर्णय—ये सभी प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं।
यदि कोई व्यक्ति या परिवार वनाधिकार, राजस्व या अन्य वैधानिक प्रावधानों के तहत अधिकार का दावा करता है, तो उसका परीक्षण नियमानुसार किया जाना चाहिए।
क्या कहता है प्रशासन
रायपुर जिला प्रशासन का कहना है कि नकटी गांव में जिस भूमि पर कार्रवाई की गई, वह शासकीय भूमि है और उस पर लंबे समय से अतिक्रमण था। प्रशासन के अनुसार संबंधित परिवारों को नियमानुसार बेदखली के नोटिस जारी किए गए तथा उसके बाद ही कार्रवाई की गई। प्रशासन का यह भी कहना है कि यह अभियान न्यायालयीय एवं राजस्व प्रक्रिया के अनुरूप संचालित किया गया।
एसडीएम स्तर से सार्वजनिक रूप से यह जानकारी दी गई कि प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की व्यवस्था समानांतर रूप से शुरू की गई है। प्रशासन के अनुसार लगभग 75 प्रभावित परिवारों को नवा रायपुर के सेक्टर-30 स्थित EWS आवासों में अस्थायी एवं स्थायी रूप से बसाने की प्रक्रिया प्रारंभ की गई और आवास आवंटन की कार्रवाई शुरू की गई।
प्रभावित परिवारों की आपत्तियाँ
प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्हें जो वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराए गए हैं, उनमें अभी पानी, बिजली, पर्याप्त स्थान और अन्य मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। उनका यह भी कहना है कि बड़े परिवारों के लिए उपलब्ध कराए गए मकान पर्याप्त नहीं हैं। इन मांगों को लेकर विस्थापित परिवारों ने प्रशासन को समय-सीमा देते हुए बेहतर पुनर्वास की मांग की है।
राजनीतिक विवाद
कार्रवाई के बाद विपक्ष ने सरकार पर संवेदनहीनता का आरोप लगाया। वहीं भाजपा के कुछ नेताओं ने भी कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठाते हुए जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की।
सरकार का पक्ष
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार ने इस पूरे प्रकरण में स्पष्ट किया कि राज्य सरकार का उद्देश्य किसी गरीब परिवार को बेघर करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक परियोजनाओं को आगे बढ़ाते हुए पात्र परिवारों का पुनर्वास सुनिश्चित करना है।
सरकार के अनुसार प्रभावित परिवारों के लिए वैकल्पिक आवास, पुनर्वास और आवश्यक मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था की गई तथा पात्र हितग्राहियों को विभिन्न सरकारी योजनाओं से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की गई। प्रशासन ने यह भी कहा कि पुनर्वास के दौरान पेयजल, बिजली, सड़क और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने पर कार्य किया जा रहा है।
विपक्ष के सवाल
विपक्ष ने सरकार से कई प्रश्न पूछे। उनका कहना था कि यदि परिवार वर्षों से वहां रह रहे थे, तो पहले उनके अधिकारों का परीक्षण होना चाहिए था। उन्होंने पुनर्वास की गुणवत्ता और समय-सीमा पर भी सवाल उठाए।
कुछ सामाजिक संगठनों ने भी मांग की कि ऐसे मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई से पहले सामाजिक प्रभाव का विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिए और प्रभावित परिवारों की सहमति व संवाद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
वर्तमान स्थिति
वर्तमान में सरकार का जोर पुनर्वास, पात्र परिवारों को योजनाओं का लाभ दिलाने और सार्वजनिक परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर है। प्रशासन का कहना है कि कानून का पालन करते हुए प्रभावित परिवारों के हितों की रक्षा करने का प्रयास जारी है। वहीं कुछ प्रभावित परिवार और विपक्ष पुनर्वास व्यवस्था को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराते रहे हैं।
आगे की चुनौती
नकटी गांव प्रकरण का अंतिम मूल्यांकन केवल अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से नहीं होगा, बल्कि इस बात से होगा कि पुनर्वास कितनी प्रभावी ढंग से पूरा होता है, विस्थापित परिवारों को सभी मूलभूत सुविधाएं समय पर मिलती हैं या नहीं, और प्रशासन अपने किए गए वादों को किस स्तर तक जमीन पर उतार पाता है। यही इस पूरे प्रकरण की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी होगी।

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