बस्तर का नया अध्याय : बंदूक से विकास तक,शहीदों के सम्मान और आदिवासी अस्मिता के संरक्षण का संकल्प,उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने नक्सलमुक्त बस्तर के लिए समाज,सुरक्षा और संवेदना का नया मॉडल के लिए शुरू किया अनोखा पहल

बस्तर का नया अध्याय : बंदूक से विकास तक,शहीदों के सम्मान और आदिवासी अस्मिता के संरक्षण का संकल्प,उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने नक्सलमुक्त बस्तर के लिए समाज,सुरक्षा और संवेदना का नया मॉडल के लिए शुरू किया अनोखा पहल

(संपादकीय : श्रीमती अमृता सहाय की कलम से)

कांकेर । कभी नक्सली हिंसा, भय और बंदूकों की छाया में जीने वाला बस्तर अब विकास, सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नई इबारत लिखने की ओर बढ़ रहा है। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा के कांकेर दौरे ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि राज्य सरकार अब केवल नक्सल उन्मूलन तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि बस्तर के सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय पुनर्निर्माण का व्यापक खाका तैयार कर रही है।

एक ओर सर्व आदिवासी समाज के प्रमुखों के साथ संवाद कर पारंपरिक संस्कृति, पेसा कानून और देवस्थलों के संरक्षण पर चर्चा की गई, वहीं दूसरी ओर नक्सली हिंसा से प्रभावित परिवारों और शहीद जवानों के परिजनों से मुलाकात कर सरकार ने संवेदनशील शासन का संदेश दिया।

बस्तर के विकास में समाज को बनाया जा रहा भागीदार

जिला पंचायत कांकेर में आयोजित सर्व आदिवासी समाज प्रमुखों की बैठक में उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रखने में समाज की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि बस्तर में नक्सल उन्मूलन केवल सुरक्षा बलों की उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज, जनप्रतिनिधियों और स्थानीय समुदायों के सहयोग का परिणाम है।उन्होंने विशेष रूप से उन समाज प्रमुखों की भूमिका को रेखांकित किया जिन्होंने हिंसा के रास्ते पर भटके युवाओं को मुख्यधारा में वापस लाने में योगदान दिया।

‘पहली बार आजादी का एहसास’

बैठक के दौरान उपमुख्यमंत्री ने ग्रामीणों के अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि दशकों तक नक्सल हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों के लोग अब स्वयं को वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र महसूस कर रहे हैं। जिन गांवों में कभी भय का वातावरण था, वहां अब मेला-मड़ई, हाट-बाजार और सामाजिक गतिविधियां फिर से शुरू हो रही हैं। उन्होंने कहा कि अब रिश्तेदार भी बिना डर गांवों में आ-जा रहे हैं और लोगों के जीवन में सामान्य स्थिति लौट रही है।

सुरक्षा कैंप बनेंगे विकास और सुविधा केंद्र

उपमुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा कैंपों को केवल सुरक्षा प्रतिष्ठान के रूप में नहीं, बल्कि ग्रामीण सुविधा केंद्रों के रूप में विकसित किया जाएगा। स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करते हुए इन क्षेत्रों में विकास मॉडल तैयार किया जा रहा है। राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान की मदद से स्थानीय परिस्थितियों और संसाधनों के अनुरूप विकास कार्यों की रूपरेखा तैयार की जा रही है।

देवस्थलों का संरक्षण और पेसा को मजबूती

बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने की दिशा में 197 गांवों के देवस्थलों का राजस्व अभिलेखों में चिन्हांकन कर स्थायी पंजीयन की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। इससे पारंपरिक आस्था स्थलों के संरक्षण को संस्थागत आधार मिलेगा,साथ ही पेसा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए गांव-गांव में स्थानीय युवाओं को पेसा मोबिलाइजर और समन्वयक के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है।

जेलों से भी शुरू होगा पुनर्वास अभियान

नक्सलवाद से जुड़े भटके हुए युवाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए सरकार अब जेलों के भीतर भी पुनर्वास कार्यक्रम संचालित कर रही है। पुनर्वास प्राप्त युवा स्वयं जेलों में जाकर अन्य बंदियों को हिंसा छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। सरकार का मानना है कि सामाजिक संवाद और पुनर्वास की प्रक्रिया नक्सलवाद के स्थायी समाधान का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।

संवेदना का दूसरा चेहरा: शहीद परिवारों के बीच पहुंचे विजय शर्मा

कांकेर कलेक्ट्रेट में उपमुख्यमंत्री ने नक्सली हिंसा से प्रभावित परिवारों और शहीद जवानों के परिजनों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनीं। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि सभी मामलों का संवेदनशीलता के साथ त्वरित निराकरण किया जाए। उन्होंने कहा कि नक्सल हिंसा से प्रभावित परिवारों और शहीदों के आश्रितों का सम्मान, सुरक्षा और पुनर्वास सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

हर बुधवार शहीद और पीड़ित परिवारों से मिलेंगे एसपी

उपमुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि प्रत्येक बुधवार जिले के पुलिस अधीक्षक नक्सली पीड़ित परिवारों और शहीद जवानों के परिजनों से नियमित मुलाकात करें तथा उनकी समस्याओं के समाधान की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करें। यह पहल प्रशासन और प्रभावित परिवारों के बीच विश्वास बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

शहीदों के नाम पर होंगे स्मारक और सार्वजनिक स्थल

राज्य सरकार ने घोषणा की है कि प्रदेशभर में शहीदों की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए गांवों के सामुदायिक भवन, चौक-चौराहों और अन्य सार्वजनिक स्थलों का नामकरण शहीदों के नाम पर किया जाएगा। जहां नक्सल हिंसा की बड़ी घटनाएं हुई हैं, वहां स्मारक निर्माण भी कराया जाएगा ताकि आने वाली पीढ़ियां शहीदों के बलिदान को याद रख सकें। इसके लिए राज्य सरकार ने समग्र निधि से 10 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।

शहीद परिवारों को आवास और रोजगार में प्राथमिकता

उपमुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि पात्र शहीद परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ सुनिश्चित किया जाए और आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया में प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने कहा कि शहीदों का बलिदान राष्ट्र और समाज के लिए अमूल्य है और उनके परिवारों का सम्मान करना राज्य की नैतिक जिम्मेदारी है।

बस्तर में ‘सुरक्षा मॉडल’ से आगे बढ़कर ‘समाज मॉडल’ की शुरुआत

बस्तर लंबे समय तक देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती का प्रतीक रहा है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियां संकेत देती हैं कि अब संघर्ष केवल बंदूक के विरुद्ध नहीं, बल्कि विकास, विश्वास और सामाजिक पुनर्निर्माण के माध्यम से लड़ा जा रहा है।

एक ओर आदिवासी अस्मिता, देवस्थलों और परंपराओं के संरक्षण की बात हो रही है, तो दूसरी ओर शहीद परिवारों के सम्मान और पुनर्वास को प्राथमिकता दी जा रही है। यदि समाज, प्रशासन और सरकार के बीच यह साझेदारी मजबूत होती है तो बस्तर देश के सामने संघर्ष से शांति और भय से विकास की एक नई मिसाल बन सकता है।

बस्तर मॉडल के प्रमुख बिंदु

नक्सलमुक्त गांवों में विकास की नई रणनीति

197 देवस्थलों का राजस्व रिकॉर्ड में दर्जीकरण

पेसा मोबिलाइजर और स्थानीय युवाओं की भागीदारी

सुरक्षा कैंपों को सुविधा केंद्रों में बदलने की योजना

जेलों के भीतर पुनर्वास अभियान

शहीदों के नाम पर स्मारक और सार्वजनिक स्थल

प्रभावित परिवारों से नियमित संवाद

शहीद परिवारों को आवास और रोजगार में प्राथमिकता

धांसू वैकल्पिक हेडिंग्स

बस्तर में बंदूक से विकास तक: विजय शर्मा ने रखा ‘नया बस्तर मॉडल’

नक्सलवाद के बाद अब विकास की लड़ाई: बस्तर में समाज और सरकार साथ-साथ

शहीदों का सम्मान, आदिवासी अस्मिता का संरक्षण और विकास का संकल्प

बस्तर बदल रहा है: जहां कभी गोलियां थीं, वहां अब विकास की गूंज

नया बस्तर, नया विश्वास: समाज, सुरक्षा और संवेदना का त्रिकोण