सलाखों के पीछे था लोकतंत्र : आपातकाल के अंधेरे से लोकतंत्र की रोशनी तक 1977 की तस्वीर ने फिर सुनाई संघर्ष की दास्तां,19 महीने की यातना के बाद आजादी की सांस और 1977 की तस्वीर बनी आपातकाल के प्रतिरोध की गवाही
आपातकाल के खिलाफ संघर्ष की गवाही बनी 1977 की तस्वीर,लोकतंत्र सेनानियों के योगदान को फिर किया गया याद
(संपादकीय लेख : प्रशांत सहाय की कलम से )
रायपुर। आपातकाल के 51 वर्ष पूरे होने और संविधान हत्या दिवस के अवसर पर वर्ष 1977 में रायपुर केंद्रीय जेल से रिहा हुए लोकतंत्र सेनानियों की एक ऐतिहासिक तस्वीर एक बार फिर चर्चा में है। यह तस्वीर उन संघर्षों, त्याग और यातनाओं की याद दिलाती है, जिन्हें आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए हजारों लोगों ने सहा था।
मई 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद रायपुर केंद्रीय जेल से रिहा हुए अनेक लोकतंत्र सेनानी इस तस्वीर में दिखाई देते हैं। इनमें जनसंघ, छात्र आंदोलन और सामाजिक जीवन से जुड़े कई प्रमुख कार्यकर्ता शामिल थे, जिन्होंने 19 महीनों तक कारावास झेलते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
लोकतंत्र सेनानियों का योगदान
स्वर्गीय बाबू पंडरी राव कृदत्त जनसंघ की विचारधारा से जुड़े सक्रिय कार्यकर्ता और संगठनकर्ता थे। उन्होंने आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और जेल यातनाएं सहन कीं।
स्वर्गीय पंडित हनुमान प्रसाद मिश्रा सामाजिक एवं वैचारिक क्षेत्र में सक्रिय रहे। वे लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थक थे तथा आपातकाल के विरोध में चल रहे आंदोलनों से जुड़े रहे।
स्वर्गीय शारदा प्रसाद शर्मा जनसंघ के सक्रिय कार्यकर्ताओं में शामिल थे। संगठन विस्तार और जनजागरण के कार्यों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। आपातकाल के दौरान उन्होंने दमन के बावजूद अपने विचारों से समझौता नहीं किया।
स्वर्गीय सोम प्रकाश गिरी सामाजिक और वैचारिक गतिविधियों से जुड़े रहे तथा लोकतंत्र बहाली के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। आपातकाल के दौरान उन्हें भी कारावास का सामना करना पड़ा।
स्वर्गीय जयंतीलाल गांधी जनसंघ और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले कार्यकर्ताओं में शामिल थे। उन्होंने लोकतंत्र की बहाली के लिए चल रहे संघर्ष में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
स्वर्गीय विट्ठल राव म्हस्के संगठनात्मक कार्यों और सामाजिक जीवन में सक्रिय रहे। आपातकाल के विरोध में उनकी भूमिका को क्षेत्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण माना जाता है।
स्वर्गीय वीरेंद्र दीपक छात्र आंदोलनों, पत्रकारिता और जनजागरण से जुड़े युवा कार्यकर्ता थे। महासमुंद-राजिम क्षेत्र में वे सामाजिक और वैचारिक गतिविधियों के लिए जाने जाते थे। मात्र 26 वर्ष की आयु में उन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। लोकतंत्र की रक्षा के लिए उनका संघर्ष युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा माना जाता है।
लाखों परिवारों पर पड़ा था प्रभाव
आपातकाल के दौरान देशभर में एक लाख से अधिक लोगों को मीसा और अन्य कानूनों के तहत गिरफ्तार किया गया। इनमें राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ छात्र, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न संगठनों से जुड़े लोग भी शामिल थे।
इस दौरान अनेक परिवारों को सामाजिक, आर्थिक और मानसिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कई युवाओं की पढ़ाई प्रभावित हुई, रोजगार के अवसर बाधित हुए और पारिवारिक जीवन भी संकट से गुजरा। लोकतंत्र सेनानियों के परिवारों ने भी लंबे समय तक अनिश्चितता और कठिन परिस्थितियों का सामना किया।
लोकतंत्र की रक्षा का संघर्ष
रायपुर केंद्रीय जेल से रिहा हुए इन लोकतंत्र सेनानियों की तस्वीर आज भी इस बात की गवाही देती है कि आपातकाल केवल राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ा गया एक व्यापक जनसंघर्ष था।
संविधान हत्या दिवस के अवसर पर लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले सभी लोकतंत्र सेनानियों के त्याग, साहस और बलिदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जा रहा है।

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